मूलनिवासीयो की आजादी का प्रथम कदम...

रानी दमयंती दीप...

आज का दिन..भारत के मूलनिवासीयो की आजादी का प्रथम कदम था.. इस कदम को भारत रत्न बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी ने 25 दिसम्बर1927 मे रखा था.. इस कदम ने भारत के मूलनिवासीयो की 2500वर्ष पुरानी गुलामी को उखाड़ फेकने रख गया था..
शूद्र कौन थे..?
आज से लगभग 2500वर्ष पूर्व भारत मे एक विधान (कानून) लागू था.. जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के शोषण और गुलामी के नियम लिखें थे.. इस समय वर्ण व्यवस्था लागू थी.इस व्यवस्था मे सबसे श्रेष्ठ ब्राम्हण होता था उसके बाद क्षत्रिय फिर वैश्य था सबसे निम्न शूद्र.वर्ण था जिसका कर्तव्य ऊपर के तीनो वर्णो की सेवा करने वाले भारत के मूलनिवासी थे.. जो आर्यो के आगमन के देश के शासक थे, जिन्हे आर्यो ने छल कपट से हराकर गुलाम बना लिया था.. फ़िर उन्हें सदियों तक गुलाम बनाने एक काला कानून बनाया गया था
जिसका नाम मनुस्मृति रखा गया!!
इस काले कानून मे महिलाओ और शूद्रो को जानवर से बुरी स्तिथि मे रखा गया था.. इस काले कानून मे महिलाओ और शूद्रो को शिक्षा के अधिकार से वँचित रखा गया था..
अगर शूद्र या कोई भी वर्ण की महिला किसी शब्द का उच्चारण करती है तो.. उनकी जिव्हा(जीभ)काटने का नियम था.. अगर कोई शूद्र या महिला किसी भी शब्द सुन लेती है तो उसके कान मे पिघला कर शीसा या गर्म सरिया डाल कर वेहरा कर दिया जाता था..ऐसे अमानवीय नियमों से मनुस्मृति भरी पढ़ी थी.. जिसमे पर्दाप्रथा, सतिप्रथा, एक स्त्री के कई पति होना, दासी प्रथा, छुआछूत भेदभाव... जिन जलाशय, और नदियों मे कुत्ते बिल्ली पानी पी सकते थे पर शूद्र का पानी छू भी नहीं सकते थे..
शूद्र वर्ण के इन अत्याचारो के शिकार बाबा साहेब अम्बेडकर भी हुये.. उन्हें स्कूल मे पानी पीने नहीं दिया जाता था.. उनके बाल नाई नहीं काटता था.. नौकरी लगने पर उन्हें चपरासी पानी नहीं देता था फाइले फेक कर दी जाती थी!
तब बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर ने सबसे पहले शूद्रो को पानी को सार्वजानिक तालाबों से पानी लेने 1920 मे महाड़ तालाब सत्याग्रह किया.. जिसमे कई शूद्र घायल हुये और उनके हाथ तोड़ा गया और सिर को सवर्णो ने फोड़ा.. बाबा साहेब अम्बेडकर ने शूद्रो को मानवीय अधिकार दिलाने कई आंदोलन किया पर काले कानून के आगे आंदोलन कारियो को कुचल दिया गया..
मनुस्मृति दहन 25 दिसम्बर 1927...
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर जी ने विभिन्न आंदोलन किये. उन सभी आंदोलनो मे सबसे बड़ा आंदोलन था आर्यो द्वारा मूलनिवासीयो (शूद्रो) और महिलाओ को गुलाम बनाने वाले काले कानून मनुस्मृति का दहन करना..
जिस किताब मे मानव को मानव नहीं समझा जाता था.. जिस किताब मे इंसानो को जानवर की तरह मारा-पीटा था. और इंसान को गुलाम बनाकर शोषण किया जाता था...
उन्होंने कहा की हमारे आपके शोषण और गुलामी की जड़ यह मनुस्मृति हम सबको इस किताब को जलाना देना चाहिए और उन्होंने अपने साथियो के साथ 25दिसम्बर 1927 को मनुस्मृति को जलाया..आज के दिन शूद्रवर्ण के अधिकांश साथी मनुस्मृति दहन दिवस के रूप मे मनाते है..
आज मनुस्मृति दहन के 97वे साल बीत गये एवं भारतीय संविधान लागू हुये 74साल बीत गये पर शूद्रो और महिलाओ के साथ अत्याचार और शोषण ज्यो का त्यों है.. बस अंतर इतना है कि शोषण करने के तरीके बदले है आज भी भारत के मूलनिवासी गुलाम है.. जो इस देश के शासक थे..!!
लेखक :- Komal Ahirwar "मूकनायक"
            सम्पर्क - 9584221414
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