आज़ादी की लड़ाई में चमार जाति के सूरवीरो की कुर्बानी को उपेक्षित कर भुला दिया- -

चमारो का गौरवशाली इतिहास


Komal Ahirwar"मूकनायक"

रानी दमयंती दीप दमोह मध्यप्रदेश


दमोह/आज देश में कई तरह की विचारधाराएं हैं और श्रेष्ठता के चक्कर में समाज में मतभेद इस कदर बढ़ गया है कि देश की सामाजिक एकता अखण्डता भी प्रभावित हो रही है और देश का नुकसान हो रहा है। दलित मुसलमान और हिन्दू में बंटे समाज में रोज दुखद घटनाएं घट रही हैं। खास कर दलित राजनीति के केंद्र में आ गया है। दलितों को दया का पात्र बनाकर सभी पार्टियों के नेता अपना भला करने में लगे हैं। सवाल यह है कि किया वाकई दलित इतना कमजोर है? आज 

देश आजाद है और हम आजादी की 73वीं वर्षगांठ मानाने जा रहे हैं, लेकिन हम में से बहुत कम लोग यह जानते हैं कि देश की आजादी की लड़ाई में दलितों में आने वाली चमार जाति के वीरो ने भी बढ़ -चढ़ कर हिस्सा लिया था और आजादी कि पहली लड़ाई की विगुल दलितों ने बजाई थी। आज शायद हम उनका योगदान भूल गए हैं या वह अपनी वीरगाथा। 15 अगस्त के मौके पर हम आपको बताएंगे कुछ ऐसे ही महान दलित वीरों के बारे में - 

दलित क्रान्तिकारी महिलाएं, जिन्होंने अंग्रेजों को धूल चटाया

            उदैया चमार- - 

बहुत कम लोग जानते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ जंग का ऐलान 1804 में ही हो गया था।  दरअसल छतारी के नवाब का वफादार और प्रिय योद्धा ऊदैया चमार ने अंग्रेजों के गलत नीतियों से खफा होकर सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया। उसकी वीरता के चर्चे आज भी अलीगढ के आस -पास के क्षेत्रो में कहे सुने जाते हैं। आखिर 1807 में अंग्रेजो ने उसे पकड़ लिया और उसे फांसी दे दी, लेकिन निडर ऊदैया ने अकेले ही अंग्रेजों से लोहा ले लिया था।   

              बाँके चमार- - 

बांके जौनपुर जिले के मछली तहसील के गांव के कुवरपुर के निवासी थे। वह अकेले ही अंग्रेजों से लोहा लेने निकल पड़े लेकिन बाद में उनसे प्रभावित होकर और लोगों ने भी उनके साथ अंग्रेजों से जंग का ऐलान कर दिया। लगातार अंग्रेजों के खिलाफ गतिविधियों के कारण उन पर 50 हजार रुपये का का इनाम अंग्रेजो ने रख दिया।  यह उस जमीन में काफी बड़ी रकम थी। पकडे जाने के बाद उनके 18 साथियो के साथ उन्हें फ़ांसी पर लटका दिया गया।

           गंगा दीन मेहतर--

गंगा दीन मेहतर गंगू बाबा के नाम से जाने जाते थे। कानपूर के लोग आज भी उन्हें सम्मान के साथ याद करते हैं और उनकी वीरता के किस्से सुनाते हैं। वह भंगी जाति के थे और उस दौरान वह पहलवानी करते थे। वह 1857 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध सतीचौरा के करीब वीरता से लड़े। कई  अंग्रेज़ों को मौत के घाट उतारने के बाद आखिर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दिया।   

मातादीन भंगी ने रखी थी 1857 की क्रांति के नींव

           मक्का पासी- - 

 1857 में मई में हुए क्रांति के बाद पूरे देश में लोगों के दिलों में अंग्रेजों को लेकर आग भड़क गई थी। 10 जून, 1857 अंग्रेज़ों की आर्मी का एक छोटा दस्ता लॉरेंस हेनरी की कमान में अवध से चिनहट और बाराबंकी जा रहा था। मक्का पासी ने 200 पासियों को लेकर उनका रास्ता रोका और कई अंग्रेज़ों को मार गिराया, लेकिन लॉरेंस ने उन्हें मर दिया। इसके बावजूद पासी समुदाय के लोगों ने हार नहीं माना और अवध के बडे भूभाग पर राज्य कर लिया। पासी समुदाय के कई लोगों ने वीरता पूर्वक अंग्रेजों से लोहा लिया। बाद में मायावती ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके  नाम शहीदों में शामिल किया, जिनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैं-  महाराजा बिजली पासी, महाराज लखन पासी, महाराजा सुहाल देव, महाराजा छेटा पासी, और महाराजा दाल देव पासी। 

         चेता राम जाटव- - 

किवंदतियों के मुताबिक महाराजा पटियाला ने एक आदमी को देखा जो एक शेर को पीठ पर लादे चला जा रहा था। पूछने पर पता चला कि उस आदमी ने ही बिना हथियार के शेर को मार गिराया है। राजा ने उसे अपने फ़ौज में शामिल होने के लिए कहा। राजा के कहने पर वह फ़ौज में शामिल हो गया। उस व्यक्ति का नाम चेता राम जाटव था। चेता राम ने अंग्रेजों से लोहा लिया। अंग्रेजों को द्वारा जनता को परेशान करता देख वह उनसे लड़ पड़े जिसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और पेड से बांध कर सूट कर दिया। 

         बालू राम मेहतर- - 

बालू ने भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ लिया और उनके 16 दलितों के साथ पेड़ से बांध कर फ़ांसी दे दी। 

         बाबू मंगू राम चमार- - 

यह जाति से चमार थे। उनका जन्म 1886 ग्राम मोगोवाल जिला होशियार पुर पंजाब में हुआ था। देश के लिये जीवन पर्यंत संघर्षरत रहे। बाद में देश आजाद होने के बाद वह राजनीति में आ गए और अपनी पार्टी ग़दर पार्टी के नाम से शुरू की।  आजीवन वह समाज के भलाई के लिए काम करते रहे।   

इनके अलावा, जीडी तपसे, भोला पासवान, पन्ना लाल बरुपाल, सन्जिवय्या, रामचंद्र वीरप्पा, वीरा पासी, सिदरन के साथ ही कई और ऐसे दलित हैं,  जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाई जिनकी जानकारी अगली पोस्ट में दूूँगा।👏👏👏👏👏👏👏👏

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